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बूंदी की बेटी डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव को स्वदेशी बायोमेडिकल इम्प्लांट तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट

रोगी की अस्थि संरचना के अनुरूप किफायती इम्प्लांट तैयार करने की मशीन विकसित; निर्माण लागत में करीब 90 प्रतिशत तक कमी की संभावना

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विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
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बूंदी की बेटी डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव को स्वदेशी बायोमेडिकल इम्प्लांट तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट
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नागरिक अभिव्यक्ति | बूंदी। बूंदी की बेटी डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव को रोगी की आवश्यकता और अस्थि संरचना के अनुरूप अधिक सटीक एवं किफायती बायोमेडिकल इम्प्लांट तैयार करने की स्वदेशी तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट प्राप्त हुआ है। उन्होंने डबल-साइडेड इंक्रीमेंटल फॉर्मिंग मशीन विकसित की है, जिसके माध्यम से रोगी की शारीरिक संरचना के अनुरूप इम्प्लांट तैयार किए जा सकते हैं।

डॉ. पर्णिका वर्तमान में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जालंधर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। वे राजकीय महाविद्यालय, बूंदी के व्याख्याता डॉ. ए.डी. श्रीवास्तव एवं डॉ. विजय बाला श्रीवास्तव की पुत्री हैं। उनकी उपलब्धि को बूंदी के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

ऑप्टिकल सेंसर से बेहतर होगी निर्माण की सटीकता

डॉ. पर्णिका द्वारा विकसित मशीन में ऑप्टिकल सेंसर आधारित फीडबैक प्रणाली का उपयोग किया गया है। यह प्रणाली इम्प्लांट निर्माण के दौरान टूल की स्थिति पर लगातार नजर रखती है और आवश्यकता के अनुसार सुधार करती है। इससे प्रक्रिया नियंत्रण, इम्प्लांट की सतही गुणवत्ता तथा उसकी ज्यामितीय सटीकता बेहतर करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

यह आविष्कार अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) द्वारा वित्त पोषित अनुसंधान परियोजना का प्रमुख परिणाम है। परियोजना का उद्देश्य बेहतर सतही गुणवत्ता एवं ज्यामितीय सटीकता के साथ कस्टमाइज्ड बायोमेडिकल इम्प्लांट के प्रभावी उत्पादन के लिए इलेक्ट्रिकली असिस्टेड हाइब्रिड डबल-साइडेड इंक्रीमेंटल फॉर्मिंग मशीन का डिजाइन और विकास करना है।

डॉ. पर्णिका इस परियोजना की प्रधान अन्वेषक हैं। परियोजना में रिसर्च एसोसिएट अरुण शर्मा एवं शोधार्थी सुधांशु पांडेय भी कार्य कर रहे हैं।

इम्प्लांट निर्माण की लागत में 90 प्रतिशत तक कमी की संभावना

वर्तमान में रोगी-विशिष्ट इम्प्लांट बनाने के लिए महंगे आयातित उपकरणों और उन्नत एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी ऊंची लागत के कारण ऐसे इम्प्लांट कई मरीजों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। वहीं, सामान्य आकार के इम्प्लांट हर मरीज की अलग-अलग अस्थि संरचना के अनुरूप पूरी तरह फिट नहीं हो सकते।

विकसित स्वदेशी प्रणाली डाई-रहित निर्माण प्रक्रिया उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती है। इसके माध्यम से मरीज के शारीरिक एवं चिकित्सीय डेटा के अनुसार इम्प्लांट को आवश्यक आकार दिया जा सकता है। प्रणाली जैव-अनुकूल सामग्रियों के प्रसंस्करण में सक्षम है और महंगी डाई तथा आयातित निर्माण सुविधाओं पर निर्भरता कम करने की दिशा में उपयोगी हो सकती है।

परियोजना के अनुमान के अनुसार, इस तकनीक से इम्प्लांट निर्माण की लागत में करीब 90 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है। वर्तमान अनुमानित लागत करीब 50 हजार से 2 लाख रुपए से घटकर लगभग 10 हजार रुपए तक आ सकती है। इसी तरह निर्माण अवधि 2 से 4 सप्ताह से घटकर लगभग 2 से 5 दिन होने का अनुमान है।

स्वदेशी तकनीक को मजबूत करने की दिशा में कदम

डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव ने कहा कि पेटेंट प्राप्त यह तकनीक रोगी-विशिष्ट इम्प्लांट को अधिक किफायती बनाने और उनकी शारीरिक अनुरूपता में सुधार करने में सहायक हो सकती है। इसके साथ ही महंगी आयातित विनिर्माण तकनीकों पर भारत की निर्भरता कम करने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि बायोमेडिकल विनिर्माण, व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवाओं और उन्नत फॉर्मिंग तकनीकों के क्षेत्र में देश की स्वदेशी अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

लागत संबंधी दावों को संतुलित करेंपेटेंट उपलब्धि का विवरण स्पष्ट करेंतकनीकी भाषा को सरल बनाएं

डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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