नागरिक अभिव्यक्ति | कोटा। कोटा जिले में पंचायती राज चुनाव की घोषणा के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सियासी हलचल तेज हो गई है। विधानसभा और हालिया निकाय चुनाव के बाद अब पंचायतों की सत्ता को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। दोनों दलों ने चुनावी रणनीति के साथ-साथ अपने-अपने मुद्दे और दावे जनता के सामने रखने शुरू कर दिए हैं।
कोटा में ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर ने पंचायत चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत का दावा करते हुए गांवों में भी पार्टी का मजबूत बोर्ड बनाने की बात कही है। दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं कोटा उत्तर विधायक शांति धारीवाल भाजपा के दावों को चुनौती देते हुए स्थानीय मुद्दों, किसानों की समस्याओं और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं।
हालिया कोटा नगर निगम चुनाव में भाजपा ने 100 में से 57 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस के खाते में 39 वार्ड आए और 4 वार्ड निर्दलीयों ने जीते। इसके बाद भाजपा ने कोटा शहर में अपना बोर्ड बनाया और अनुसुईया गोस्वामी महापौर निर्वाचित हुईं।
भाजपा का दांव : ‘तीसरा इंजन’ और विकास का रिपोर्ट कार्ड
ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर के बयानों से संकेत मिलता है कि भाजपा पंचायती राज चुनाव को सरकार के कामकाज और संगठन की जमीनी पकड़ के परीक्षण के रूप में देख रही है। भाजपा की रणनीति में केंद्र और राज्य सरकार के बाद पंचायतों में भी पार्टी का बोर्ड बनाने को ‘तीसरे इंजन’ के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है।
नागर ने हालिया बयान में दावा किया कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार ने बिजली, पानी, सड़क और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में काम किया है और इनका असर गांवों तक पहुंचा है। उन्होंने पंचायत चुनाव में भी भाजपा की मजबूत जीत तथा कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर करने का दावा किया है।
भाजपा की रणनीति का एक अहम हिस्सा हालिया निकाय चुनाव के प्रदर्शन को भी ग्रामीण मतदाताओं के सामने रखना है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि शहर के बाद अब गांवों में भी भाजपा को बहुमत मिलने से विकास कार्यों में निरंतरता और गति लाई जा सकेगी।
कांग्रेस का पलटवार : सरकार के कामकाज को बनाएगी चुनावी मुद्दा
दूसरी ओर कांग्रेस पंचायती राज चुनाव को केवल पार्टी बनाम पार्टी का चुनाव न रखकर ग्रामीण समस्याओं और सरकार की जवाबदेही से जोड़ने की कोशिश कर रही है। शांति धारीवाल का रुख इसी रणनीति की ओर इशारा करता है।
कांग्रेस की ओर से हालिया निकाय चुनाव को भी अपने पक्ष में राजनीतिक तर्क के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि अंतिम परिणामों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन कांग्रेस का प्रदर्शन भी 39 वार्डों तक रहा।
कांग्रेस का तर्क है कि निकाय चुनावों में मिली सीटों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में अलग राजनीतिक समीकरण काम कर सकते हैं। यहां स्थानीय प्रत्याशी, पंचायत स्तर के विकास कार्य, किसानों की समस्याएं और रोजमर्रा से जुड़े मुद्दे चुनावी नतीजों पर ज्यादा असर डाल सकते हैं।
‘खाद संकट’ को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी
ग्रामीण चुनाव में कांग्रेस का सबसे बड़ा फोकस खाद की उपलब्धता और किसानों की परेशानी पर रहने के संकेत हैं। पार्टी का आरोप है कि यूरिया और डीएपी की उपलब्धता को लेकर किसानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और कथित कालाबाजारी ने समस्या को और बढ़ाया है।
ऐसे में कांग्रेस किसानों के बीच खाद संकट को सरकार की ग्रामीण नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था से जोड़कर सवाल उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं की पहुंच का प्रभावी संदेश किसानों तक पहुंचाए।
गांवों में बदलेगा चुनावी गणित
शहरी निकाय चुनाव के मुकाबले पंचायती राज चुनाव का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण अलग होता है। पंचायत समिति और जिला परिषद स्तर पर स्थानीय संबंध, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत प्रभाव, गांव में किए गए विकास कार्य और प्रत्याशी की छवि अहम भूमिका निभाते हैं।
यही वजह है कि दोनों दल अब पार्टी संगठन के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रत्याशियों की तलाश में जुट गए हैं। टिकट वितरण के दौरान क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समीकरण साधना भी दोनों पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती होगी।
भाजपा के सामने शहर की जीत को गांवों तक पहुंचाने की चुनौती
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती हालिया शहरी सफलता को ग्रामीण क्षेत्रों में दोहराने की है। कोटा नगर निगम में 57 वार्ड जीतने के बाद पार्टी के पास उत्साह और संगठनात्मक बढ़त जरूर है, लेकिन पंचायत चुनाव का भूगोल और मतदाता व्यवहार अलग है।
भाजपा ‘तीसरे इंजन’ के नारे के साथ ग्रामीण मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि केंद्र और राज्य के बाद पंचायत स्तर पर भी उसकी सरकार होने से विकास योजनाओं का बेहतर समन्वय हो सकेगा।
कांग्रेस के सामने वापसी का अवसर
कांग्रेस के लिए पंचायती राज चुनाव ग्रामीण स्तर पर संगठन को मजबूत करने और हालिया निकाय चुनाव की चुनौती से उबरने का अवसर भी है। पार्टी यदि किसानों की समस्याओं, स्थानीय विकास और सरकार के कामकाज से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाती है तो वह कई पंचायत क्षेत्रों में मुकाबला कड़ा कर सकती है।
हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों की तलाश की होगी। पंचायत चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बूथ और गांव स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं को कितना सक्रिय कर पाती है।
किसके पक्ष में झुकेगा ग्रामीण वोट?
कोटा का पंचायती राज चुनाव अब केवल प्रधान और जिला प्रमुख के चुनाव तक सीमित राजनीतिक मुकाबला नहीं रह गया है। यह चुनाव भाजपा के लिए सरकार के कामकाज और हालिया शहरी सफलता को ग्रामीण क्षेत्र में दोहराने की परीक्षा है, जबकि कांग्रेस के लिए किसानों और स्थानीय मुद्दों के सहारे वापसी का मौका।
एक तरफ ‘तीसरा इंजन’, विकास और संगठन भाजपा की रणनीति के केंद्र में हैं, तो दूसरी तरफ खाद संकट, ग्रामीण समस्याएं और सरकार से जवाबदेही कांग्रेस के प्रमुख हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं।
आने वाले दिनों में टिकट वितरण, बागी प्रत्याशियों की सक्रियता, स्थानीय गठजोड़ और गांव-गांव में उठने वाले मुद्दे इस चुनाव की दिशा तय करेंगे। फिलहाल इतना तय है कि कोटा में पंचायती राज चुनाव ने ग्रामीण राजनीति का पारा चढ़ा दिया है और अब दोनों दलों की नजर गांव की सरकार पर है।
दावों और तथ्यों को अलग करेंपंचायती राज चुनाव का दायरा स्पष्ट करेंदोहराव घटाकर खबर कसें
