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रक्तदान, देहदान महादान है, लेकिन समय का दान भी महादान है : योगेश मुनि

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा में हो रहे नियमित प्रवचन।

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रक्तदान, देहदान महादान है, लेकिन समय का दान भी महादान है : योगेश मुनि
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नागरिक अभिव्यक्ति | कोटा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवन 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 के सानिध्य में चातुर्मास तप एवं त्याग के साथ निरंतर गतिमान है। पूज्य योगेश मुनि महाराज साहब ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में जो भी कार्य करना हो, उसके प्रति श्रद्धा, निष्ठा और निरंतर प्रयास होना आवश्यक है। कार्य करते समय एकाग्रता और विवेक बनाए रखना चाहिए। रास्ते में कितनी भी परेशानियां आएं, उनका सामना करने का भाव रखें, लेकिन यह संकल्प भी होना चाहिए कि हमारे कारण किसी दूसरे व्यक्ति को परेशानी न हो। महाराज श्री ने सेवा और परोपकार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है। रक्तदान महादान है, लेकिन समय का दान भी महादान है।

किसी जरूरतमंद के लिए अपना समय देना, उसकी सहायता करना और उसके दुख-दर्द में सहभागी बनना भी महत्वपूर्ण सेवा है। उन्होंने श्रद्धालुओं से संकल्प लेने का आह्वान किया कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक लोगों की मदद करें। उन्होंने कहा कि गूंगा व्यक्ति वह नहीं है, जिसकी जुबान नहीं है, बल्कि वास्तविक अर्थों में वह व्यक्ति गूंगा है जो गुरु के गुणों का गुणगान नहीं करता। गुरु के बताए मार्ग को जीवन में उतारना और उनके गुणों का स्मरण करना आत्मकल्याण का माध्यम है।

- अपनी काया में भगवान को बिठा लें

जितेन्द्र मुनि महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपनी काया में भगवान को बिठाने का प्रयास करना चाहिए। भगवान को बाहर खोजने के बजाय उनके गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार द्रव्य और पर्याय के रूप में स्थित है। किसी भी गुण की अभिव्यक्ति के लिए द्रव्य का होना आवश्यक है। जो व्यक्ति द्रव्य को पहचान लेता है, वह शाश्वत तत्व को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ता है। महाराज श्री ने जैन दर्शन के संदर्भ में द्रव्य की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि संसार में अनेक प्रकार के द्रव्य और उनकी पयार्यें विद्यमान हैं। मूल द्रव्य के रूप में स्वयं की आत्मा को पहचानना आवश्यक है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने वाला व्यक्ति बाहरी आकर्षणों से हटकर अपने भीतर की ओर बढ़ता है।

- जमीकंद में अनेक जीव, त्याग का बताया महत्व

जमीकंद वनस्पतियों के विषय में बताते हुए कहा कि इनमें अनेक जीवों का निवास माना गया है। इसलिए जैन धर्म में अहिंसा की भावना से ऐसे आहार का त्याग करने की प्रेरणा दी जाती है। उन्होंने कहा कि जीवों के प्रति करुणा और संवेदना रखना धर्म का महत्वपूर्ण आधार है। मनुष्य को अपने आहार-विहार में भी अहिंसा और जीवदया का ध्यान रखना चाहिए। योगेश मुनि महाराज ने कर्म सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि कर्म एक ऐसे मेहमान हैं, जो बिना बुलाए नहीं आते। यदि कर्म हमारे जीवन में आते हैं तो उसके पीछे हमारे स्वयं के भाव और कर्मबंध की प्रक्रिया होती है। उन्होंने कहा कि हमारे स्पंदन ही कर्मों को आकर्षित करते हैं। साधना करने वाला व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले इन स्पंदनों को पहचानने का प्रयास करता है और उन्हें नियंत्रित करके आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के भाव, विचार और व्यवहार उसके जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए साधना केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि अपने भीतर उठने वाले राग-द्वेष, क्रोध, मोह और अन्य विकारों को पहचानना भी साधना का हिस्सा है।

संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि जीवन में सेवा, संयम, आत्मचिंतन और जीवदया को स्थान देना चाहिए, यहां आने वाले श्रावक इसका प्रयास कर रहे हैं। मंत्री अनिल दक ने कहा कि समय का सदुपयोग करें और अपने भीतर ऐसे भाव पैदा करें, जिनसे स्वयं के साथ-साथ समाज के अन्य लोगों का भी कल्याण हो।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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