कोटा। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवान 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. के सानिध्य में चातुर्मास तप, त्याग और धार्मिक साधना के साथ जारी है। इसी क्रम में नियमित धर्मसभा में संतों ने श्रद्धालुओं को धर्म, दया, मैत्री, संयम और आत्मचिंतन का महत्व बताया।
पूज्य नंदीषेण मुनि जी म.सा. ने प्रवचन में ग्रहण के उदाहरण के माध्यम से संसार और धर्म के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि तीन प्रकार के ग्रहण बताए गए हैं—पाणिग्रहण, सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण। सूर्य और चंद्रग्रहण प्राकृतिक घटनाएं हैं, जबकि पाणिग्रहण सांसारिक जीवन से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म धर्म साधना और आत्मकल्याण के लिए हुआ है, लेकिन संसार में प्रवेश करने के बाद वह अपने मूल उद्देश्य को भूल जाता है। सांसारिक आकर्षण, मोह और भौतिक गतिविधियां व्यक्ति को धर्म के वास्तविक उद्देश्य से दूर कर देती हैं। ऐसे में समय-समय पर आत्मचिंतन करना जरूरी है कि मानव जीवन किस उद्देश्य से प्राप्त हुआ है।
मुनि ने कहा कि मानव जीवन दुर्लभ है और इसे केवल सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। धर्म, दया, मैत्री, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से क्रोध और स्वार्थ से दूर रहकर दया, नि:स्वार्थ सेवा और मैत्री भाव को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
संग्रह नहीं, सदुपयोग और उदारता में है वस्तु का गौरव
श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि किसी वस्तु या संपत्ति का वास्तविक गौरव उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और उदारता में है। उदारता से ही धन गौरव का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि गुरु के दर्शन से आंखें और जिनवाणी के श्रवण से कान सार्थक होते हैं। मनुष्य को ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनसे उसकी इंद्रियां और मानव जीवन धर्म एवं आत्मकल्याण के मार्ग में उपयोगी बन सकें।
दया भाव की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि किसी दुखी व्यक्ति का दुख देखकर जिसका हृदय द्रवित हो जाए, उसके भीतर दया का भाव होता है। जो व्यक्ति अपनी परवाह किए बिना दूसरे के दुख को महसूस करता है और उसे दूर करने का प्रयास करता है, वही वास्तविक अर्थों में दयावान है। दया हृदय को कोमल बनाती है और व्यक्ति को सद्गति के योग्य बनाती है।
उन्होंने कहा कि संसार के सभी जीवों को अपनी आत्मा के समान मानना ही मैत्री भाव है। मैत्री का भाव जीव को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। जहां स्वार्थ की भावना होती है, वहां मित्रता हो सकती है, लेकिन नि:स्वार्थता से ही वास्तविक मैत्री का भाव विकसित होता है।
मुनि ने तीर्थंकर भगवान को सर्वाधिक दयावान बताते हुए कहा कि सभी जीवों के कल्याण की भावना व्यक्ति को उच्च आध्यात्मिक अवस्था की ओर ले जाती है। पाप और गलत प्रवृत्तियां जीवन में अनेक समस्याओं का कारण बनती हैं। इसलिए व्यक्ति को क्रोध के स्थान पर दया और सद्भाव का मार्ग अपनाना चाहिए।
संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि सभी श्रावकों को धर्मलाभ की भावना से प्रवचन सुनकर उनके संदेश को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। संघ मंत्री अनिल दक ने बताया कि चातुर्मास के दौरान नियमित प्रवचन हो रहे हैं और बड़ी संख्या में श्रावक इसका लाभ ले रहे हैं।
