कोटा। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवान 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 के सानिध्य में चातुर्मास तप एवं त्याग के साथ निरंतर गतिमान है। चातुर्मास के दौरान श्रावक-श्राविकाएं नियमित रूप से प्रवचन एवं धार्मिक कार्यक्रमों का लाभ ले रहे हैं।
श्रावकों द्वारा किए जा रहे उपवास क्रम में खुशी पीतलिया के 16 उपवास तथा संतोष जैन, पत्नी सुनील जैन, कंसुआ वालों के 11 उपवास गतिमान हैं।
बुधवार को प्रवचन में पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा. ने साधु जीवन की कठिन साधना और संयम के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधु अनेक प्रकार के परीषहों को सहन करते हुए संयम के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। साधु के लिए संयम का मार्ग कठिन और अनुशासनपूर्ण होता है।
उन्होंने कहा कि राग-द्वेष से भ्रष्ट हुआ श्रावक सम्यक दर्शन को प्राप्त कर सकता है, लेकिन संयम से भ्रष्ट हुआ साधु उसी स्थिति में सम्यकत्व को प्राप्त नहीं कर सकता। साधु जीवन में संज्वलन कषाय का उल्लेख करते हुए उन्होंने संयम की सूक्ष्मता को समझाया। साधु को आरंभ और समारंभ से दूर रहना चाहिए। साधु जीवन त्याग, संयम, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक साधना पर आधारित है।
नंदीषेण मुनि ने कहा कि **संयम का पालन केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि भीतर की वृत्तियों पर नियंत्रण का भी नाम है।** साधु जब राग-द्वेष और कषायों पर विजय पाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तभी उसकी साधना सार्थक होती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन दुर्लभ है और इसे केवल भौतिक सुख-सुविधाओं में व्यतीत करने के बजाय आत्मकल्याण और धर्म साधना में लगाना चाहिए। गृहस्थ हो या साधु, जीवन की सार्थकता इसी में है कि व्यक्ति अपने आचरण से स्वयं को ऊपर उठाए और दूसरों के लिए दु:ख का कारण न बने।
भौतिक साधनों के साथ आध्यात्मिक चेतना का संतुलन जरूरी
पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि संसार में दो प्रकार की जीवनशैली दिखाई देती है—मानव और पशु। मनुष्य को श्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि उसमें संज्ञान, विवेक और संतुलन जैसे गुण होते हैं। पशु में पशुता स्वाभाविक रूप से रहती है, लेकिन यदि मनुष्य के भीतर पशु प्रवृत्तियां हावी हो जाएं तो उसका जीवन अधोगति की ओर जा सकता है। इसलिए मनुष्य को किसी के दु:ख का कारण नहीं बनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन जीने के दो प्रमुख मार्ग बताए गए हैं—गृहस्थ और साधु। गृहस्थ अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए जीवन जीता है, जबकि साधु का जीवन संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के उद्देश्य से समर्पित होता है। साधु जीवन को आगमकारों ने कठिन आश्रम बताया है, क्योंकि संयम के मार्ग पर अनेक कठिनाइयों और परीषहों का सामना करना पड़ता है।
योगेश मुनि ने कहा कि संयम के मार्ग पर साधु समय-समय पर अपनी वृत्तियों को पहचानता है और आत्मा की अनुभूति की दिशा में आगे बढ़ता है। जड़ पदार्थों की अधिकता व्यक्ति में जड़ता पैदा कर सकती है, इसलिए जीवन में भौतिक साधनों के साथ आध्यात्मिक चेतना का संतुलन आवश्यक है।
उन्होंने सद्गृहस्थी की विशेषता बताते हुए कहा कि सद्गृहस्थ कम से कम हिंसा करते हुए जीवन चलाने का प्रयास करता है। वह पाप से बचते हुए सद्कर्म और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की सोच रखता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के अनुग्रह और सहयोग से जीवन जीता है। गृहस्थ जीवन में व्यक्ति जड़ और चेतन दोनों के सहयोग का उपयोग करता है, लेकिन दूसरे जीवों को अपने समान समझना ही सद्गृहस्थी
की वास्तविक पहचान है।
