कोटा चिंग सिटी के नाम से दुनियाभर में विख्यात कोटा राजस्थान ही नहीं बल्कि देश का इंडस्ट्रीयल हब हुआ करता था। लेकिन, कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और निजी स्वार्थों की पूर्ति के आगे यह पहचान मिटती चली गई। इसके बाद डॉक्टर और इंजीनियर बनाने की फैक्ट्री के लिए शहर का नाम फिर चमका। पर, दो दशक के अंदर इस उद्योग ने भी शहर के आर्थिक तंत्र को फिर कटघरे में खड़ा कर दिया। अंधाधुंध कमाई और स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की कमी ने इस उद्योग से जुड़े कारोबारियों ने केवल अपनी जेबें भरने की सोच को विकसित किया, न ही शहर को ऊंचाइयों पर ले जाने की नीयत को। इसका असर यह रहा कि अचानक आए संकट ने कोटा को हिला कर रख दिया। प्रकृति का यह शाश्वत नियम है कि जिसके पास अच्छे विकल्प होंगे, वह लंबे समय तक टिका रहेगा। इसी भाव और विचार को कोटा ने बिसरा दिया। एक ही विकल्प के पीछे सारी ताकत को झोंक देने से विकट परिस्थितियों में संभलने का अवसर नहीं मिलता। कभी आैद्योगिक नगरी के पीछे दौड़कर हम पीछे रह गई तो इस समय कोचिंग सिटी की। कोटा को भी बहुविकल्प के आदर्श सूत्र से बांधना होगा, ताकि एक हिस्सा कमजाेर पड़े तो दूसरा सिरा उसको थामे रखे। हाड़ाैती के सर्वांगीण विकास के लिए बहुविकल्प पर काम करना होगा। पर्यटन इंडस्ट्री बाहें फैलाकर हमारे सामने खड़ी हैं, जिसे केवल हवा देने की जरूरत है। इसके बाद वह ऊंचाइयों को छूने लगेगी। फिलहाल सबसे पहले इसे थपथपाकर आगे बढ़ाना है। यह काम हमारे हाड़ौती क्षेत्र के जनप्रतिनिधि बड़ी आसानी से कर सकते हैं। उनका केन्द्र और राज्य की डबल इंजन सरकार में अच्छा-खासा दबदबा है। आज उनके किए गए प्रयास हाड़ौती के आने वाले दशकों और सदियों की बुनियाद को रखने का काम करेंगे।
मानव सभ्यता के विकास का गवाह कोटा : हाड़ौती क्षेत्र मानव सभ्यता के विकास का गवाह भी रहा। मध्य पाषाण और नव पाषाण काल के दौरान की संस्कृति को समझने के लिए यहां बड़ी संख्या में रिसर्चर आते हैं। किशोर सागर के पास स्थित ब्रज विलास पैलेस के म्यूजियम में आदिमानव से मानव बनने तक के सफर के जीवंत प्रमाण हैं। कोटा के कपिलधारा बारां अलनिया क्षेत्र में पत्थरों के हथियार मिले। बूंदी के होलासपुर में शैल चित्र और पत्थरों के हथियार मिले। दुर्भाग्य यह है कि हाड़ौती का युवा ही इससे अछूता है तो दुनिया को कैसे यहां तक लेकर आएगा? 25 मार्च 1948 को पहली बार हमारे राज्य का नामकरण राजस्थान के रूप में हुआ और कोटा को राजधानी बनाया गया था। इसके जीवंत प्रमाण शहर में गढ़ पैलेस स्थित राव माधोसिंह म्यूजियम में मौजूद हैं। पूर्व महाराव भीमसिंह द्वितीय पहले राजप्रमुख मनोनीत किए। 30 मार्च 1949 को जयपुर को राजधानी बना दिया गया। इतिहास की ऐसी कई सुनहरी यादें हैं जिन्हें पुनर्जीवित करने का काम किया जाए तो पर्यटन उद्योग को ऑक्सीजन मिल सकती है। हाड़ौती के ऐतिहासिक और नैसर्गिक सौंदर्य से दुनिया को परिचय कराने के लिए जनवरी में कोटा हाड़ौती ट्रैवल मार्ट का आयोजन हुआ। इसका सकारात्मक असर पर्यटन पर नजर आया। हाड़ौती ट्रैवल मार्ट को देश और दुनिया के प्रमुख ट्रैवल मार्ट जैसे सभी मंचों पर ले जाना होगा। उनको हाड़ौती के चारों जिलों की खूबियों, विरासत, संस्कृति, इतिहास और धरोहरों को बताना होगा। अतीत, वर्तमान और भविष्य की सुनहरी तस्वीर दिखानी होगी, इसके बाद पावणों की भीड़ भी यहां पर आने लगेगी और नया उद्योग इस अंचल में दस्तक देगा। बस, यहां के जनप्रतिनिधियों को इस नई इकॉनोमी को बूस्ट करने के लिए पूरी ताकत से धक्का लगाना होगा।
विकसित करें स्किल इंडस्ट्री: हाड़ौती में स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसे कई केन्द्रों की स्थापना के लिए अंचल के नीति-निर्धारकों को प्रयास करने होंगे। केन्द्र संभाग के चारों जिलों में स्थापित हो जाएं तो हमारे युवा ट्रेनिंग लेकर देश-विदेश में नौकरी के लिए तैयार हो पाएंगे और कमाई के साथ करियर के नए अवसर खुलेंगे। अब कौशल आधारित शिक्षा, प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। युवाओं को ऐसी स्किल्स सिखाई जाएंगी, जिनकी मांग विदेशों में अधिक है। उनकी ट्रेनिंग ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुसार होगी। सुरक्षित रोजगार मिलेगा। विदेशों में काम करने वाले हाड़ौती के युवाओं से आने वाला विदेशी मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा। इसी तरह से एमएसएमई और स्टार्टअप काे बढ़ावा देने के लिए और तेजी से काम करना होगा। हाड़ौती के युवाओं को उड़ने के लिए पखं मिलेंगे तो अंचल के सारे सपने भी साकार होंगे।
