गहलोत-पायलट के सामने वर्चस्व की चुनौती तो भाजपा की अग्नि परीक्षा
नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की आहट ने राजधानी से लेकर ग्रामीण चौपालों तक का सियासी पारा चढ़ा दिया है। इसे 2028 के विधानसभा चुनाव का असली लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ भाजपा के सामने अपनी सत्ता की पकड़ को धरातल तक साबित करने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अपने खोए हुए आधार को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है। लेकिन, इस बार का पंचायती रण केवल भाजपा बनाम कांग्रेस का पारंपरिक मुकाबला नहीं रह गया है।
गांव की सियासत जातियों के गोलबंद समीकरणों में भी उलझी हुई दिखती है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के संयोजक हनुमान बेनीवाल का आक्रामक रुख और शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी का तेजी से बढ़ता जनाधार दोनों बड़े दलों की नींद उड़ाए हुए है। इसके अलावा, पूर्वी राजस्थान में भी क्षेत्रीय नेताओं की खींचतान ने मुकाबले को बहुकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है।
ऐसे में पंचायत चुनाव सिर्फ गांव की सरकार चुनने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि नेताओं की जमीनी पकड़ और संगठन की ताकत का भी आकलन करेंगे। टिकटों से लेकर जातीय समीकरणों और स्थानीय गुटबाजी तक हर मोर्चे पर सियासी गुणा-भाग देखने को मिलेगा। चुनावों के नतीजों का असर न सिर्फ नेताओं की राजनीति पर पढ़ेगा बल्कि यह नेताओं का कद भी तय करेगा।
आरएलपी का किसान कार्ड, भाटी की क्रांति और राजपरिवार की सक्रियता
नागौर से सांसद और आरएलपी के मुखिया हनुमान बेनीवाल ने रैलियों से चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है। उनका पूरा ध्यान ग्रामीण वोट बैंक, किसान मुद्दों और जाट बहुल सीटों पर है। उनके तेवरों से साफ है कि वे इस बार किसी समझौते के मूड में नहीं हैं और आरएलपी अकेले दम पर कई जिला परिषदों में 'किंगमेकर' बनने की स्थिति में दिख रही है। दूसरी ओर, बाड़मेर-जैसलमेर के बाद अब पूरे प्रदेश में अपनी पैठ बना रहे निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी प्रमुख दलों के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे हैं। युवा रोजगार और ईडब्ल्यूएस आरक्षण के मुद्दों को लेकर वे जिस तरह से भीड़ जुटा रहे हैं, उससे ग्रामीण युवाओं के बीच उनका क्रेज लगातार बढ़ रहा है। भाटी का यह प्रभाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के परंपरागत कैडर वोट बैंक में सीधी सेंध लगा रहा है। इधर, पूर्व मंत्री और पूर्व राजपरिवार के सदस्य विश्वेंद्र सिंह एक बार फिर अपने पुराने तेवरों के साथ पूर्वी राजस्थान में सक्रिय हैं। डीग-भरतपुर और ब्रज क्षेत्र के जाट बहुल इलाकों में उनके सियासी कदमों ने भाजपा व कांग्रेस दोनों ही खेमों में हलचल पैदा कर दी है। समीकरण बताते हैं कि सिंह का रुख पूर्वी राजस्थान की कई सीटों के नतीजों पर असर डालेगा। वहीं, आक्रामक और विद्राेही युवा नेता नरेश मीणा ने भी अपनी सक्रियता से राजनीतिक माहौल गरमा दिया है, जिससे मीणा बहुल इलाकों के समीकरण उलझते दिख रहे हैं। ऐसे में सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने को कई गुणा-भाग होना तय हैं।
भाजपा : शर्मा की परीक्षा, वसुंधरा फैक्टर से राठौड़ की रणनीति तक
सत्ता संभाल रही भाजपा के लिए यह पंचायत चुनाव सरकार की साख और लोकप्रियता की असली परीक्षा है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पार्टी की जन-कल्याणकारी योजनाओं, सुशासन और बुनियादी ढांचे के विकास के दावों को धरातल पर भुनाने की कोशिश में है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच टिकटों को लेकर खींचतान पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रभाव भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और पंचायत चुनावों में उनके समर्थक नेताओं की भूमिका तथा स्थानीय समीकरणों पर उनकी छाप को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में विभिन्न प्रभावशाली धाराओं के बीच संतुलन बनाना भी चुनौती है। इस बीच, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने टोंक दौरे के दौरान गहलोत और डोटासरा पर तीखे हमले बोलते हुए कांग्रेस के अंदरूनी अंतर्विरोधों को हवा दी हैं। हालांकि, इस दौरान उन्होंने सचिन पायलट का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया। राजनीतिक विश्लेषक राठौड़ के इस रुख को केवल बयानों तक सीमित नहीं मान रहे हैं, बल्कि इसे कांग्रेस के भीतर गुटीय असंतोष को बढ़ाने और 'जाट बनाम गुर्जर' समीकरणों के जरिए भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की एक सोची-समझी रणनीतिक चाल के रूप में देख रहे हैं।
कांग्रेस: गहलोत का अनुभव, पायलट का क्रेज, डोटासरा की धाक
विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल स्थानीय निकायों पर कब्जा जमाने का जरिया नहीं, बल्कि 2028 की वापसी का रोडमैप भी है। हालांकि, पार्टी के भीतर का अंदरूनी शक्ति संतुलन अब भी चर्चा का विषय है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जहां अपने विशाल सांगठनिक अनुभव और पुराने ग्रामीण नेटवर्क के भरोसे कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में लगे हैं, वहीं सचिन पायलट समर्थकों की नजरें पंचायत स्तर पर युवा चेहरों को टिकट दिलाने पर टिकी हैं। पार्टी आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती गहलोत और पायलट की केमिस्ट्री को धरातल पर एक साथ उतारना है, ताकि निचले स्तर का कार्यकर्ता भ्रमित न हो। अगर कांग्रेस अपने आंतरिक असंतोष को दबाकर पंचायत चुनाव में मजबूत प्रदर्शन करने में नाकाम रहती है, तो आरएलपी और निर्दलीय उसके मुख्य विपक्षी स्थान पर अपना दावा मजबूत कर लेंगे। इसी बीच, चुनावों और मतदाता सूचियों के मुद्दे पर सचिन पायलट ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा, "पहले देश में नोटबंदी हुई थी और अब ये वोटबंदी लेकर आए हैं।" पायलट के इस 'वोटबंदी' वाले बयान ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। वहीं, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी तीखा तंज कसते हुए कहा कि भाजपा पर अब 'वोट चोरी' का तमगा लग चुका है।
सत्ता का सिंहासन पाने सियासी गुणा-भाग सुलझाने में जुटे प्रदेश के दिग्गज
