इतनी बड़ी संख्या में निर्दलीयों की जीत ने प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरणों और नई तरह की सोच के विकसित होने के संकेत दिए। जनता ने परंपरागत सियासत के तरीकों से हटकर स्वच्छ राजनीति और सही नेता को चुनने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ाया।
सत्ता के सेमीफाइनल के रूप में हुए राजस्थान में शहरी सरकार के चुनावों में भले सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दल कांग्रेस अपनी-अपनी जीत के बड़े दावे करें। लेकिन इस चुनाव ने सबसे बड़ा संकेत प्रदेश में राजनीति के विकल्प के भी दिए। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस जितनी ताकत निर्दलीयों और तीसरे मोर्चे की दिखी। उनके वादों और चुनाव मैदान में उतारे गए नए चेहरों पर जनता ने भरोसा जताया और जिताया भी। राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों को देखें तो 309 शहरी निकायों के 10 हजार 244 वार्ड के परिणामों में भाजपा ने 4 हजार 179 वार्ड जीते। कांग्रेस के खाते में 3 हजार 613 वार्ड आए तो निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2 हजार 273 वार्डों में जीत दर्ज की। यानी 22 प्रतिशत हिस्सेदारी इन्होंने दर्ज कराई।
इतनी बड़ी संख्या में निर्दलीयों की जीत ने प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरणों और नई तरह की सोच के विकसित होने के संकेत दिए। जनता ने परंपरागत सियासत के तरीकों से हटकर स्वच्छ राजनीति और सही नेता को चुनने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ाया। ढाई साल बाद राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले निर्दलीयों और तीसरे मोर्चे की बढ़ती ताकत ने दोनों दलों को अंदरखाने तक हिलाकर रख दिया। कई बड़े निकायों में तो निर्दलीय किंगमेकर बनकर सामने आए। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 42, भारत आदिवासी पार्टी ने 8, बहुजन समाज पार्टी ले 19, सीपीआईएम ने 38, आरएलपी ने 63 सीटों पर जीत दर्ज की। करीब 170 वार्डों में तीसरे मोर्चों के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की।
निकाय चुनावों में निर्दलीय पार्षद बड़ी ताकत बनकर उभरे। इनमें बड़ी संख्या भाजपा और कांग्रेस के ही बागी उम्मीदवारों ने अपने दलों को चुनौती देकर उन्हें मात दी। राज्य की 10 नगर निगमों में चार पर भाजपा और एक पर कांग्रेस को बहुमत मिला। जबकि पांच निगमों में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। ऐसे में इन निगमों में निर्दलीयों ने तय किया कि महापौर और बोर्ड किस पार्टी का बनेगा। 47 नगर परिषदों में भी 28 में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भाजपा ने 12 और कांग्रेस ने 6 नगर परिषदों में जीत दर्ज की, जबकि बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने बहुमत हासिल किया। इसी तरह से 252 नगर पालिकाओं में भाजपा 149 पर जीतने में कामयाब रही, जबकि कांग्रेस ने 95 नगर पालिकाओं में जीत दर्ज की। आठ पालिकाओं में निर्दलीयों का दबदबा रहा।
मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में निर्दलीयों ने छोड़ा सबको पीछे : इस चुनाव में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले परिणाम मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह प्रदेश भरतपुर से सामने आए। यहां नगर निकाय चुनाव की एक नगर निगम और 6 नगर पालिकाओं के कुल 235 वार्डों में चुनाव हुए। इनमें भाजपा ने 66, कांग्रेस ने 15, बसपा ने 1, आरएलपी ने 1 और 152 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। नतीजों में निर्दलीयों ने सभी राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ दिया। भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों के परिणामों में भी निर्दलीयों का दबदबा रहा। यहां 36 वार्डों में निर्दलीय, 20 वार्डों में भाजपा, 7 वार्डों में कांग्रेस, एक वार्ड में बसपा और एक वार्ड में आरएलपी के उम्मीदवार जीते। इसके बाद भाजपा और उसकी चुनावी तैयारियों पर सवाल उठे। मुख्यमंत्री अपने घर में पार्टी को जीत नहीं दिला पाए आैर भरतपुर के जनता के मन को नहीं जीत पाए। ऐसे में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती निकलकर इस चुनाव में सामने आई। आने वाले पंचायत चुनाव में भी इसी तरह के परिणाम रहे तो भाजपा की न केवल चिंता बढ़ेगी, बल्कि मुख्यमंत्री की क्षेत्र में पकड़ और दूर हो जाएगी।
भाजपा के इन दिग्गजों की ताकत भी क्षेत्राें में कमजोर दिखी : राजस्थान के शहरी निकायों में आमतौर पर भाजपा का आधार मजबूत माना जाता रहा है। लेकिन इस बार कई बड़े शहरों और भाजपा के दिग्गज नेताओं के इलाकों के परिणाम पार्टी के लिए चिंता का कारण बने। जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी का रहा। जोधपुर से लगातार तीन बार सांसद रहे केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत के अपने वॉर्ड में भाजपा हार गई। बीकानेर में केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता अर्जुनराम मेघवाल के क्षेत्र में कांग्रेस बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। अलवर में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर रही। यहां निर्दलीय पार्षदों ने बोर्ड बनाया। अजमेर में कांग्रेस ने 36 साल बाद बोर्ड बनाने में कामयाबी हासिल की। अजमेर से केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी और राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी आते हैं। ऐसे में यहां कांग्रेस की बढ़त भाजपा के लिए राजनीतिक तौर पर अहम रही। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि यहां भाजपा राजनीतिक जोड़-तोड़ करके अपना बोर्ड बनाने में कामयाब रही। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की सियासी रणनीति पर कड़े सवाल जरूर उठे। इतना ही नहीं, प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज की।
निर्दलीय और छोटे दलों ने बढ़ाई बड़े दलों की चिंता: निकाय चुनावों में इस बात का संकेत भी मिला कि कई जगह मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों के बजाय स्थानीय निर्दलीय उम्मीदवारों को चुना। बारां में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा। वहीं बीकानेर के नोखा में सीपीआई (एम) को बहुमत मिला। राजस्थान की परंपरागत राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई रही है। ऐसे में इन जगहों पर तीसरे राजनीतिक विकल्प का उभरना दोनों प्रमुख दलों के लिए चिंता का कारण बन सकता है।
