हाड़ौती के ऑटोमोबाइल सेक्टर में पिछले चार दशकों से धाक जमाने वाले 'भाटिया एंड कंपनी' के निदेशक प्रेम भाटिया आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वर्ष 1979 से शुरू हुआ यह सफर अब तीसरी पीढ़ी तक आ पहुँचा है। मारुति के मोनोपोली दौर से लेकर ईवी के बदलते ट्रेंड, व्यापार के उतार-चढ़ाव और शराब के धंधे को छोड़ कर्म को पूजा बनाने तक... उनके व्यक्तिगत जीवन के अनछुए पहलुओं पर वरिष्ठ पत्रकार समकित जैन की प्रेम भाटिया से बेबाक बातचीत के मुख्य अंश:
Q| आपने वर्ष 1979 में बिजनेस की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक इस बाजार में कितना बड़ा बदलाव देखते हैं?
जवाब: आज हमारी तीसरी पीढ़ी बिजनेस में है। 1979 के दौर में ऑटोमोबाइल बाजार में कुछ ही कंपनियों का एकाधिकार था। मॉडल में बदलाव नहीं होते थे और ग्राहकों की पसंद का कोई खास महत्व नहीं था। मुझे याद है, शुरुआती दौर में तकनीक और विदेशी सहयोग के कारण गियर बॉक्स जैसे मुख्य पार्ट्स आयात करने पड़ते थे। आज सप्लाई ज्यादा है और प्रतिस्पर्धा कड़ी है। अब गाड़ियाँ कस्टमर फीडबैक और आरएंडडी (R&D) के आधार पर बनती हैं। आज कार बाजार में उतारने के पहले कंपनियां सीधे हमसे और ग्राहकों से फीडबैक लेती हैं कि उन्हें कौन सा रंग या फीचर्स चाहिए।
Q| हाड़ौती के लोग किस तरह की कारें पसंद करते हैं? आप कौन सी कार चलाते हैं?
जवाब: बीच में एक ट्रेंड आया था जब लोगों ने देखा-देखी बड़ी 20 से 26 लाख की एसयूवी गाड़ियां खरीदीं। समस्या यह है कि शहर में पार्किंग की पर्याप्त जगह नहीं है। मैं खुद शहर के भीतर वैगनआर इस्तेमाल करता हूँ, क्योंकि यह बहुत व्यावहारिक और कंफर्टेबल है। हाईवे पर जाने के लिए बड़ी कार का उपयोग करता हूँ।
Q| पहले लोग शोरूम पर आकर गाड़ी देखते थे, आज पूरी रिसर्च करते हैं। कार बेचने में सहूलियत हुई या चुनौती बढ़ी?
जवाब: आज का ग्राहक पूरी रिसर्च, फीचर्स और ग्लोबल रैंकिंग देखकर आता है। हमारी चुनौती बढ़ गई है और सेल्स टीम को लगातार अपग्रेड करते है। मारुति हमारे स्टाफ को रेगुलर ट्रेनिंग देती है। हमने खुद एक समर्पित ट्रेनिंग सेंटर बना रखा है, जो सालभर चलता है। युवाओं को 6 महीने के स्टाइपेंड पर ट्रेनिंग दी जाती है।
Q| आपकी कंपनी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कितने लोगों को रोजगार दे रही है?
जवाब: ऑटोमोबाइल सेक्टर देश में सबसे ज्यादा रोजगार देने के साथ-साथ सरकार को जीएसटी, रोड टैक्स, इंश्योरेंस और फ्यूल के रूप में सबसे ज्यादा रेवेन्यू भी देता है। हमारी कंपनी वर्तमान समय में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 1,500 से 2,000 लोगों को रोजगार दे रही है।
Q| बाजार में नए ब्रांड्स और डीलरशिप्स आ रहे हैं। कॉम्पिटिशन को कैसे देखते हैं?
जवाब: मारुति का नेटवर्क बेजोड़ है। हर 20 किलोमीटर पर हमारा सर्विस सेंटर और शोरूम उपलब्ध है। भारतीय ग्राहक को यह भरोसा चाहिए कि उसकी गाड़ी कहीं भी खराब हो, उसे तुरंत सर्विस मिल जाए। 5 से 13 लाख रुपए के सेगमेंट में आज भी लोग मारुति को ही पहली पसंद मानते हैं। कई नई कंपनियां गाड़ियां तो बेच देती हैं, लेकिन उनके पास पर्याप्त स्पेयर पार्ट्स और मजबूत सर्विस मैकेनिज्म नहीं होता। इस वजह से ग्राहक बाद में परेशान होते हैं और अंत में उन्हें गाड़ी कबाड़ के भाव बेचनी पड़ती है।
Q| सोशल मीडिया के दौर में बिना वेरिफिकेशन के शिकायतें वायरल हो जाती हैं। आप इसे कैसे हैंडल करते हैं?
जवाब: जब भी कोई क्रिटिकल केस आता है, तो मैं खुद ग्राहक से सीधे संवाद करता हूँ। अक्सर समस्या ईगो की होती है कि उन्हें सही अटेंशन नहीं मिला। मारुति 2 साल की वारंटी देती है, लेकिन ग्राहक को संतुष्ट करने के लिए हमने एक विशेष बजट रखा है। ग्राहक की मुस्कान और संतुष्टि ही हमारा मुख्य ध्येय है।
Q| कोटा को 'टूरिज्म सिटी' बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस पर आपका क्या मानना है?
जवाब: मेरा मानना है कि यदि राजनेताओं की मजबूत इच्छाशक्ति और दूरदर्शी सोच हो, तो कोटा पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर बड़ा मुकाम हासिल कर सकता है। हाल ही में हमारे द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शतरंज टूर्नामेंट में देश भर से आए 400 मेहमान कोटा के रिवर फ्रंट और ऑक्सीजन पार्क को देखकर दंग रह गए थे। हमें बस एक सकारात्मक और बड़ी सोच की जरूरत है।
Q| आप ईवी का भविष्य कैसा देखते हैं? आपकी नजर में व्यावहारिक चुनौतियाँ और जमीनी अनुभव क्या हैं?
जवाब: ईवी एक बेहतरीन विकल्प है, लेकिन जब तक इसका चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और पूरा नेटवर्क मजबूत नहीं होगा, तब तक इसे पूर्ण सफल नहीं कहा जा सकता। आज रोड कनेक्टिविटी शानदार होने से लोग ईवी खरीदना तो चाहते हैं, लेकिन मन में एक डर है। कोटा, बारां, बूंदी और झालावाड़ के कई ग्राहकों ने मुझसे कहा कि उन्हें डर लगता है कि यदि बीच रास्ते में बैटरी खत्म हो गई तो क्या करेंगे, क्योंकि वहां पेट्रोल-डीजल का विकल्प नहीं है। करीब 6 महीने पहले मैं जयपुर जा रहा था। निवाई के पास चाय पीने रुका, तो वहां एक ईवी चार्ज हो रही थी, जिसे फुल चार्ज होने में करीब 45 मिनट लग गए। आज के शानदार हाईवेज पर जहां लोग समय बचाना चाहते हैं, वहां चार्जिंग के लिए इतना लंबा इंतजार अखरता है। सरकार को पेट्रोल पंपों की तरह फास्ट चार्जिंग स्टेशन्स का विस्तार करना चाहिए। इसके अलावा, ग्राहकों में ईवी ड्राइविंग को लेकर अवेयरनेस की कमी है। यदि गाड़ी को 80 से 90 किमी/घंटा की नियंत्रित गति पर चलाया जाए, तो वॉट क्षमता का सही इस्तेमाल होता है और रेंज बहुत शानदार मिलती है। खाली सड़क देखकर एक्सीलरेटर दबाने से बैटरी पर लोड पड़ता है और रेंज कम हो जाती है।
