इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आधा आषाढ़ बीत गया है लेकिन कोटा क्षेत्र पर मानसून अभी तक मेहरबान नहीं हुआ है। गाँवों में घास भैरू की सवारी निकालना शुरू हो गया है और कोटा शहर में भी लोग इस बात पर चर्चा करने लगे हैं कि क्या गढ़े भैरू जी को निकालना ही होगा?
जो लोग घास भैरू या गढ़े भैरू से परिचित नहीं हैं, उनकी जानकारी के लिये बता दूँ कि भैरू शब्द भारतीय वांग्मय में वर्णित भैरव का ही अपभ्रंश है। माना जाता है कि भैरू की उत्पत्ति भगवान शिव के रूधिर के अंश से हुई है। हालांकि उनका संबंध उग्र साधना से जोड़ा जाता है लेकिन लोक का विश्वास है कि भैरू जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि तो दूर दूर तक है। हाड़ौती अंचल में भी लोग भैरू की पूजा अलग अलग रूपों में करते हैं। टिपटा में नीलकंठ मंदिर के पास की एक गली में खुलखुल्या भैरूजी का स्थान है। प्राचीनकाल में मान्यता थी कि जिस किसी को व्हूपिंग कफ याने खुलखुली खाँसी की शिकायत हो, वो इस स्थान पर मनौती मानते हुए यदि एक दीपक जला दे तो उसे अपनी बीमारी में आराम मिलने लगता है।
मैं फिलहाल इस टोटके के ज्योतिषीय पक्ष की बात नहीं करना चाहता, लेकिन इतना जानता हूँ कि बीमारी से आराम मिलने में व्यक्ति का अपना मनोबल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यदि किसी स्थान पर किया गया इस तरह का टोटका किसी के मनोबल को बढ़ाता है तो उसकी उपयोगिता को स्वीकार लिया जाना चाहिये। बीमारियाँ टोटकों से नहीं जातीं, लेकिन टोटके यदि व्यक्ति के मन में यह विश्वास जागृत करते हैं कि वह स्वस्थ हो रहा है, तो उनकी मनोवैज्ञानिक उपादेयता है।
घास भैरू के रूप में एक बड़ा सा पत्थर होता है, जिसे सिंदूर लगाकर किसी सार्वजनिक स्थान पर रखा जाता है। पुराने कोटा शहर में कुछ स्थानों पर आज भी ऐसे घास भैरू देखे जा सकते हैं। जब बरसात नहीं होती तो लोग एकत्र होकर घास भैरू की सवारी निकालते हैं। सवारी क्या होती है, रस्सियों से बाँधकर उस पत्थर को सार्वजनिक रास्तों पर घसीटते हैं। देवताओं के साथ इस तरह का पंगा लोक ही ले सकता है। हाड़ौती अंचल के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे धन्नालाल सुमन की घास भैरू पर एक बहुत ही मज़ेदार कविता थी। खैर। घास भैरू की सवारी की परंपरा एक सीख भी देती है। लोकतंत्र के देवताओं को याद रखना चाहिये कि यदि जनता के सुखों की अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे तो जनता सवारी घसीटने में भी कोताही नहीं बरतती।
यदि घास भैरू से भी बात नहीं बनती तो लोग गढ़े भैरू जी को याद करते हैं। जब बारिश की सारी उम्मीदें खत्म होने लगती हैं तो सड़क को खोदकर इस प्रतिमा को निकाला जाता है। बुजुर्गों के अनुभव बताते हैं कि अब तक जिस दिन भी गढ़े भैरू जी को निकाला गया है, भले ही एक बादली बरसे, लेकिन शहर में बारिश अवश्य होती है।लोक के विश्वास की यही ताकत है।
जीवन की हर करवट में विज्ञान के तर्क को तलाशने वाले इन उपायों की चर्चा पर नाक भौं सिंकोड़ते हैं। लेकिन जीवन किसी की नफरत या हिकारत के कारण नहीं रूकता। जीवन की नदी के प्रवाह को केवल प्रेम ही स्पंदित कर सकता है। यह प्रेम जिस्मानी प्रेम नहीं होता। जिस्म से जो कामना जागती है, वो तो आसक्ति या वासना को प्रश्रय देती है। प्रेम आत्माओं का मिलन होता है। यह अलग बात है कि आजकल का प्रेम अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिये प्रिय को मारकर उसकी आत्मा को उसके शरीर से अलग करने की घटनाओं के कारण चर्चा में रहता है। रिश्तों में आ घुसी उमस ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है। लेकिन फिलहाल तो बात मौसम में समाई उमस की। बादल बरसें। यह उमस मिटे। किसानों के चेहरे खिलें और हम भी पसीने से नहाने के बजाय बरसात में नहा पाऐ तो शायद हमारी जन्मकुंडली का चंद्रमा शायद कुछ शुभ हो सके।
(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)
