नागरिक अभिव्यक्ति । उदयपुर
भींडर पंचायत समिति क्षेत्र के वाणिया तलाई स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय, नारदा में जर्जर भवन ने मंगलवार को बच्चों की जान जोखिम में डाल दी। कक्षा-कक्ष की कमजोर छत का बड़ा हिस्सा अचानक भरभराकर नीचे गिर गया। मलबे और प्लास्टर की चपेट में आने से सात से आठ वर्ष की उम्र के तीन बच्चे घायल हो गए। सिर और शरीर पर चोट लगने के बाद बच्चे खून से लथपथ हो गए। हादसे के बाद सबसे गंभीर सवाल स्कूल में शिक्षक की मौजूदगी और बच्चों की तत्काल देखरेख को लेकर खड़े हुए हैं। घायल बच्चों का कहना है कि जिस समय छत का प्लास्टर गिरा, उस दौरान कक्षा में कोई शिक्षक मौजूद नहीं था। डर और चोट के बावजूद तीनों घायल बच्चे खुद पैदल अपने घर पहुंचे और परिजनों को घटना बताई। इसके बाद परिजन उन्हें राजकीय जिला चिकित्सालय भींडर लेकर गए, जहां उपचार कराया गया।
हादसे में काजल (7) पुत्री शांतिलाल मीणा, कृष्णा (7) पुत्र भेरुलाल मीणा और ललित (8) पुत्र नारायण लाल मीणा घायल हुए। अचानक छत से प्लास्टर का भारी हिस्सा गिरने से कक्षा में अफरा-तफरी मच गई। हादसे के बाद कमरे में टूटी कुर्सियां, बिखरा प्लास्टर और जंग लगे सरियों के टुकड़े नजर आए। इससे भवन की जर्जर हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। संयोग से शिक्षक की टेबल और कुर्सी भी उसी हिस्से के नीचे थी, जहां प्लास्टर गिरा। प्लास्टर गिरने के साथ टेबल टूट गई। ग्रामीणों का कहना है कि अगर उस समय शिक्षक वहां बैठे होते तो हादसा और गंभीर हो सकता था।
हादसे के समय शिक्षक कहां थे, इस पर भी अब विवाद खड़ा हो गया है। घायल बच्चों के मुताबिक एक शिक्षक छुट्टी पर थे और दूसरे शिक्षक वाणिया तलाई गए हुए थे। इसी वजह से हादसे के वक्त कक्षा में कोई शिक्षक नहीं था। हालांकि बाद में संबंधित शिक्षक की ओर से मौके पर मौजूद होने की बात कही गई। दोनों दावों के बीच स्थिति साफ करने के लिए स्कूल का उपस्थिति रजिस्टर और उस समय की वास्तविक स्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हादसे के बाद ग्रामीणों ने यह सवाल भी उठाया कि अगर शिक्षक घटनास्थल पर मौजूद थे तो चोटिल बच्चों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने की पहल क्यों नहीं हुई और उन्हें अकेले घर जाने की नौबत क्यों आई।
विद्यालय में कुल 37 बच्चों का नामांकन है, जबकि यहां दो शिक्षक तैनात हैं। इनमें एक स्थायी और दूसरा संविदा पर कार्यरत बताया गया है। घटना के बाद अतिरिक्त ब्लॉक शिक्षा अधिकारी रमेश चंद्र खटीक ने स्कूल पहुंचकर उपस्थिति रजिस्टर की जांच की। जांच के दौरान एक शिक्षक की अनुपस्थिति दर्ज मिली। बाद में संबंधित शिक्षक की ओर से छुट्टी पर होने की जानकारी दी गई। इस पूरे घटनाक्रम ने स्कूल की निगरानी, स्टाफ की उपलब्धता और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों के अनुसार यह भवन पहली बार सवालों के घेरे में नहीं आया है। वर्ष 2020 में भी स्कूल की छत खराब होने के बाद उसकी मरम्मत और प्लास्टर कराया गया था। इसके बावजूद कुछ वर्षों बाद वही छत फिर जवाब दे गई। ग्रामीणों का आरोप है कि भवन की वास्तविक मजबूती पर ध्यान देने के बजाय कई बार रंग-रोगन के जरिए उसकी खामियों को ढकने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि केवल कक्षा-कक्ष ही नहीं, स्कूल के कार्यालय की छत भी खराब हालत में है। ऐसे में किसी बड़े हादसे की आशंका पहले से बनी हुई थी।
घटना के बाद अधिकारियों के मौके पर पहुंचने को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी दिखाई दी। ग्रामीणों के मुताबिक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी राजेंद्र कुमार को विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता तक तलाशना पड़ा और वे मुख्य सड़क पर स्कूल का स्थान पूछते नजर आए। इसको लेकर सवाल उठा कि जिस विद्यालय भवन की हालत पहले से खराब बताई जा रही थी, वहां नियमित निरीक्षण और निगरानी कितनी गंभीरता से हो रही थी।
हादसे की सूचना मिलते ही प्रशासनिक टीम स्कूल पहुंची। विकास अधिकारी गुलाब सिंह गुर्जर, तहसीलदार सतीश चंद्र पाटीदार, पीईओ अमृतलाल मीणा, पटवारी वारता चौबीसा, ग्राम विकास अधिकारी गुलाब सिंह शक्तावत और एएनएम इन्द्रा मेघवाल समेत अधिकारियों ने मौके की स्थिति देखी। जर्जर भवन को जोखिम भरा मानते हुए उसे बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही 37 विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित नहीं हो, इसके लिए सुरक्षित और छायादार वैकल्पिक परिसर में कक्षाएं संचालित करने की व्यवस्था तलाशने को कहा गया है।
अब मामला सिर्फ तीन बच्चों के घायल होने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि जिस स्कूल भवन की छत को वर्षों पहले ही मरम्मत की जरूरत पड़ चुकी थी, वहां बच्चों को पढ़ाने की अनुमति क्यों बनी रही। यदि छत कमजोर थी तो समय रहते कक्षा बंद क्यों नहीं की गई। शिक्षक की उपस्थिति को लेकर उठे सवालों की भी जांच होगी या मामला केवल भवन बंद करने तक सीमित रह जाएगा। हादसे ने यह जरूर सामने ला दिया है कि सरकारी स्कूलों में भवन की सुरक्षा, नियमित निरीक्षण और बच्चों की निगरानी की व्यवस्था कागज से निकलकर जमीन पर कितनी कारगर है।
