राजेश जैन
पत्रकार, लेखक
एवं स्तंभकार
दुनिया को आज पहले से कहीं अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है, लेकिन युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और महाशक्तियों के टकराव ने सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता को चुनौती दी है। सवाल है कि क्या संयुक्त राष्ट्र 21वीं सदी की समस्याओं का समाधान कर सकता है या उसे अपनी भूमिका और कार्यप्रणाली में बुनियादी बदलाव करने होंगे?जलवायु परिवर्तन, महामारियां, आतंकवाद और साइबर सुरक्षा सीमाओं से परे चुनौतियां हैं; इनके समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।
युद्ध रोकने की उम्मीद और सुरक्षा परिषद की सीमाएं : द्वितीय विश्वयुद्ध की तबाही के बाद 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाना, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों का सम्मान बढ़ाना और देशों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना था। संयुक्त राष्ट्र ने बातचीत का साझा मंच उपलब्ध कराने के साथ शांति स्थापना अभियानों, मानवीय सहायता, शरणार्थियों की मदद और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। हालांकि, जब बड़े संघर्षों में महाशक्तियों के हित टकराते हैं, तब इसकी सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस महत्वपूर्ण गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्तावों को वीटो करके रोक सकते हैं। यही संयुक्त राष्ट्र की मूल दुविधा है। शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा करने वाली संस्था की प्रभावशीलता उन्हीं शक्तिशाली देशों के सहयोग पर निर्भर करती है, जिनके बीच मतभेद गंभीर संकट पैदा करते हैं। जब ये देश सहमत होते हैं, तो सामूहिक कार्रवाई की संभावना बढ़ती है; टकराव होने पर फैसले अटक सकते हैं। इसलिए चुनौती केवल प्रस्ताव पारित करने की नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावी कार्रवाई में बदलने की भी है।
बदलती दुनिया और प्रतिनिधित्व का सवाल : संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक संरचना आज से अलग थी। तब उपनिवेशवाद का प्रभाव व्यापक था और अनेक वर्तमान स्वतंत्र देश अस्तित्व में नहीं आए थे। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकारों की संरचना में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। सुधार की वार्ताएं जारी हैं, लेकिन नए सदस्यों, उनके अधिकारों और वीटो व्यवस्था के भविष्य पर सहमति बनाना कठिन रहा है। यह केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की वैधता और उसके निर्णयों पर वैश्विक भरोसे से जुड़ा विषय है। हालांकि, परिषद का विस्तार अपने आप में प्रभावशीलता की गारंटी नहीं है। सुधार ऐसा होना चाहिए, जिससे संस्था अधिक प्रतिनिधि, जवाबदेह और कार्यक्षम बने।
युद्ध और कूटनीति से आगे भी है संयुक्त राष्ट्र की भूमिका : स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, बाल अधिकार, शरणार्थियों की सहायता और सतत विकास के क्षेत्रों में भी संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और खाद्य एवं कृषि संगठन जैसी संस्थाएं देशों के बीच सहयोग, तकनीकी सहायता और मानवीय कार्यक्रमों को समर्थन देती हैं। जलवायु परिवर्तन, महामारियां और खाद्य संकट जैसी चुनौतियों के लिए साझा प्रयास जरूरी हैं। सितंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र के भविष्य शिखर सम्मेलन में ‘भविष्य के लिए समझौता’ अपनाया गया।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है संयुक्त राष्ट्र? : भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सैनिकों और अन्य कर्मियों का योगदान देता रहा है तथा सुरक्षा परिषद में सुधार और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र से हर विवाद का समाधान हो जाने की अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है। देशों को राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए साझा नियमों और संस्थाओं को भी मजबूत करना होगा।
प्रासंगिकता नहीं, सुधार है असली सवाल : संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं की आलोचना जरूरी है, लेकिन उसके महत्व को पूरी तरह खारिज करना समाधान नहीं है। सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधि बनाने, वीटो के इस्तेमाल में जवाबदेही बढ़ाने, शांति स्थापना और मानवीय सहायता के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान को मजबूत करने की जरूरत है। सदस्य देशों को राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा प्रतिबद्धताओं के प्रति जिम्मेदारी निभानी होगी। संयुक्त राष्ट्र न तो दुनिया की सभी समस्याओं का जादुई समाधान है और न ही केवल औपचारिक बैठकों का मंच। उसकी उपयोगिता संवाद, सहयोग और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अवसर उपलब्ध कराने में है। संयुक्त राष्ट्र की परीक्षा है कि देश मतभेदों के बावजूद सहयोग करें।
