वर्ष 1997 में आई फिल्म 'औजार' का मशहूर डायलॉग है 'जब दो दोस्त दुश्मन बनते हैं, तो और भी ज्यादा खतरनाक होते हैं।' यह डायलॉग आज हाड़ौती की सियासत पर बिल्कुल सटीक बैठता है। कोटा-बूंदी संसदीय क्षेत्र में इन दिनों लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और कांग्रेस नेता प्रहलाद गुंजल के बीच की सियासी अदावत चरम पर पहुंच गई है। दोनों कभी दोस्त हुआ करते थे और अब बयानों से दुश्मनी जग-जाहिर है। जुबानी तीर इस कदर चल रहे हैं कि मर्यादा की सीमाएं लांघने लगी हैं। गुंजल द्वारा बिरला को 'सेठजी' और उनके करीबी माने जाने वाले कोटा दक्षिण के विधायक संदीप शर्मा को 'मुनीम' बताने के बाद अब कोटा की राजनीतिक फिजां में बयानबाजी का उबाल आ गया है।
प्रहलाद गुंजल लंबे समय तक भाजपा में रहे और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का बेहद करीबी माना जाता था। गुंजल और ओम बिरला का राजनीतिक सफर भी कभी एक ही धुरी के इर्द-गिर्द घूमता था, लेकिन वक्त बदला और समीकरण भी बदल गए। साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रहलाद गुंजल कोटा-बूंदी सीट से भाजपा के टिकट की दावेदारी कर रहे थे। हालांकि, पार्टी ने आलाकमान और तत्कालीन निवर्तमान स्पीकर ओम बिरला पर ही दोबारा भरोसा जताया। अपनी अनदेखी से नाराज गुंजल ने भाजपा को अलविदा कह दिया और पाला बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने भी बिना वक्त गंवाए गुंजल को 'इनाम' के तौर पर ओम बिरला के सामने लोकसभा का टिकट थमा दिया। चुनाव बेहद दिलचस्प और कांटे का रहा, लेकिन अंतिम नतीजों में ओम बिरला ने प्रहलाद गुंजल को 41,139 मतों के अंतर से शिकस्त दे दी। चुनाव नतीजों के बाद लगा था कि यह तल्खी थमेगी, लेकिन हार ने इस सियासी अदावत की खाई को और गहरा कर दिया।
लोकसभा चुनाव से शुरू हुई तल्खी, निगम चुनाव से पहले एक बार फिर गरमाई
दोनों पक्षों के सियासी वजूद दांव पर
प्रहलाद गुंजल के इस 'सेठ-मुनीम' वाले बयान के बाद भाजपा खेमे में भारी नाराजगी देखी जा रही है। भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक जिम्मेदार नेता द्वारा तीन बार के सांसद, देश के लोकसभा अध्यक्ष और स्थानीय विधायक के खिलाफ इस तरह की अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना उनकी हताशा को दर्शाता है। वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस खेमा गुंजल के इस आक्रामक रुख को पूरी ताकत से सोशल मीडिया पर सपोर्ट कर रहा है। हांलाकी, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जंग अब सिर्फ विचारधारा की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत साख की बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह जुबानी जंग उग्र रूप ले सकती है, क्योंकि दोनों ही पक्षों के अपने-अपने सियासी वजूद दांव पर लगे हैं। बयानों से निगम चुनाव से पहले हाड़ौती की सियासत गर्मा गई हैं।
"बिरला का हाथ न होता तो काकाजी भी छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बन पाते" : विधायक संदीप शर्मा
कोटा दक्षिण से भाजपा विधायक संदीप शर्मा द्वारा बिना नाम लिए प्रहलाद गुंजल पर तीखा हमला बोलने से सियासत में उबाल आ गया। पिछले दिनों एक सार्वजनिक मंच से गुंजल पर निशाना साधते हुए विधायक संदीप शर्मा ने कहा - अगर ओम बिरला का हाथ आपके सिर पर नहीं होता, तो आपके काकाजी भी कभी छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बन पाते। बिरला जी ने ही उंगली पकड़कर आपको राजनीति सिखाई, छात्रसंघ अध्यक्ष बनाया और बाद में भाजपा देहात का जिलाध्यक्ष भी बनवाया। आज आपकी जो भी राजनीतिक पहचान है, वह सब बिरला जी की ही बदौलत है। एहसान मानने के बजाय आप उन्हीं पर उंगली उठा रहे हैं।
"मुगालते में न रहे, किसी का नाखून बराबर भी एहसान नहीं, मुनीम लिमिट में रहें" : प्रह्लाद गुंजल
लोकसभा चुनाव के समय भाजपा से कांग्रेस में आए फायर ब्रांड नेता प्रहलाद गुंजल ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज में पलटवार किया। कहा- किसी का मेरे ऊपर नाखून बराबर भी एहसान नहीं है। कोई इस मुगालते में न रहे कि मुझे किसी ने बनाया है। मैंने अपने दम पर छात्र राजनीति से लेकर मुख्यधारा की राजनीति तक का सफर तय किया है। यह मच्छर बराबर लोग आजकल ज्ञान बांट रहे हैं। मैंने बिरला जी को 'सेठजी' और संदीप शर्मा को उनका 'मुनीम' कहा है। मुनीमों को अपनी लिमिट में रहकर ही बात करनी चाहिए। अपनी हैसियत से बाहर जाकर न बोलें। अगर दम है तो अपने सेठजी से कहिए कि वे खुद सामने आकर बोलें, तब मैं उनसे सीधे बात करूंगा।
