मैं खुद खिलाड़ी रहा हूँ। मेरा विजन है, देश के कुल अंतरराष्ट्रीय कुश्ती पदकों में आधी हिस्सेदारी अकेले राजस्थान की हो। पिछले डेढ़ साल में हमारे खिलाड़ियों ने 8 अंतरराष्ट्रीय पदक जीते है। अगला लक्ष्य है कि वैश्विक मंच पर भारत जितने भी मेडल जीते, उसमें से 50% हमारे पहलवान लाएं। व्यवस्था में दो बड़े बदलाव किए हैं। पहले खिलाड़ियों को नेशनल खेलने के लिए जयपुर से त्रिवेंद्रम जैसी लंबी दूरी ट्रेन से तय करनी पड़ती थी। थकावट के कारण वे अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाते थे। अब बालक-बालिका दोनों वर्गों के खिलाड़ियों को राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भेजने के लिए हवाई सफर की सुविधा दी जा रही है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले मैट पर होते हैं, जबकि हमारे यहाँ सिर्फ मिट्टी के पारंपरिक अखाड़े थे। इस तकनीकी अंतर को खत्म करने के लिए हम हर जिले में सर्वसुविधायुक्त 'मॉडल अखाड़ा' बना रहे हैं। इनमें आधुनिक मैट, उत्तम जिम और प्रशिक्षित कोच होंगे। बेटियों के लिए महिला कोच नियुक्त की जा रही हैं।
बड़े रिफॉर्म्स : पेंशन, कॉरपोरेट सपोर्ट और क्लीन सिस्टम
पर्यटन विभाग के साथ मिलकर ग्रामीण मेलों में कुश्ती दंगल का आयोजन, ताकि खेल दोबारा जन-जन तक पहुँचे।प्रतिभावान खिलाड़ियों की डाइट और ट्रेनिंग के लिए बड़ी कंपनियों से सीएसआर एग्रीमेंट किए जा रहे हैं। इनाम का स्तर बढ़ाकर विजेताओं को कार और बाइक दी जा रही है। सरकारी नौकरी मिले, इसके प्रयास हैं। पूर्व बुजुर्गों पहलवानों के सम्मान में 10,000 मासिक पेंशन शुरू की गई है।
