नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
रामपुरा स्थानक में आयोजित धर्मसभा में योगेश मुनि जी महाराज ने कहा कि जीवन की सार्थकता मर्यादा और नियमों के पालन में है। व्यक्ति के भीतर अपने संकल्पों के प्रति इतनी दृढ़ता होनी चाहिए कि कोई परिस्थिति या प्रलोभन उसे साधना के मार्ग से विचलित नहीं कर सके। उपवास का वास्तविक उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि मनुष्य की बुराइयों, इच्छाओं और पाप प्रवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करना है। भूखा रहना आसान है, लेकिन इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग करना कठिन है।
महाराज श्री ने कहा कि साधना के लिए आगम चर्चा और धर्मचिंतन निरंतर जरूरी है। व्यक्ति को खानपान में संयम रखने के साथ सूर्यास्त से पूर्व भोजन ग्रहण करने जैसे धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए। नियमों के प्रति निष्ठा और दृढ़ संकल्प से ही व्यक्ति जीवन की बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकता है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा ने मनुष्य को अज्ञानता से बाहर निकालने और सही मार्ग दिखाने के लिए धर्म एवं मर्यादा का रास्ता बताया है। संसार में जीव की भटकन का कारण अज्ञानता है। व्रत, संयम और आत्मानुशासन इस भटकन को समाप्त करने के माध्यम हैं। श्रावक जीवन में रहते हुए व्यक्ति को धर्म के प्रति जागरूक रहना चाहिए। व्रतों से इच्छाओं को सीमित करने और आवश्यकताओं पर नियंत्रण रखने की क्षमता विकसित होती है।
योगेश मुनि जी ने श्रावकों को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है? इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने से जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध होता है।
संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि व्रत और नियम अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। धर्म केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारना जरूरी है। संघ मंत्री अनिल दक ने कहा कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए संयम, मर्यादा, त्याग और आत्मचिंतन को अपनाना आवश्यक है।
